सुदर्शन चक्र ने तीनों लोकों में घुमाए ऋषि दुर्वासा

सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का हथियार है, इस बात को तो हममें से अधिकतर लोग जानते हैं। परंतु आज इस लेख में हम सुदर्शन चक्र की महत्ता और भगवान कृष्ण की महिमा का वर्णन करेंगे।

एक समय की बात हैं इक्ष्वाकुवंशीय कुल के राजा अम्बरीष (Ambareesh) अपने राज्य में सुख से राज्य करते थे। प्रजा भी राजा की प्रशंसा करते हुए आराम से जीवन व्यतीत कर रही थी। राजा अम्बरीष किसी भी प्रकार का सुख-वैभव, धन-संपदा या किसी भी प्रकार के अवगुण जैसे ईर्ष्या, क्रोध, लालच आदि से दूर रहते हुए परमात्मा में अपना ध्यान लगाते हुए रहते थे। उन्होंने अपने राज्य व पूरी संपत्ति को भगवान विष्णु को समर्पित कर रखा था।

अम्बरीष (Ambareesh) की भक्ति भावना

भक्ति-भाव से जीवन बिताते हुए, दान-पुण्य करते हुए प्रभु का नाम लेते हुए वे प्रजा को परिवार मानते हुए रह रहे थे। उनका मानना था कि सुख के ये संसाधन और भौतिक वस्तुओं की समाप्ति तो एक न एक दिन हो ही जाएगी, पर मरणोपरांत भी जो साथ जाएगी वो है ईश्वर भक्ति, तपस्या और आराधना।

श्री कृष्ण का सुदर्शन चक्र बना अम्बरीष का रक्षा कवच

कृष्ण भगवान अपने इस भक्त की श्रद्धा, भक्ति और त्याग भावना से अत्यंत प्रसन्न थे और इसी कारण उन्होंने अपना सुदर्शन चक्र अम्बरीष के रक्षा कार्य हेतु तैनात कर रखा था। अन्य शब्दों में हम यह कह सकते हैं भगवान की कृपा राजा अम्बरीष पर हमेशा बनी रहती थी।

एक बार राजा अम्बरीष ने प्रण लिया कि वे एक वर्ष तक द्वादशी का व्रत करेंगे। प्रत्येक द्वादशी को दान-पुण्य करना, ब्राह्मणों को भोजन कराना और व्रत का पालन करना राजन ने अपना नियम बना लिया था। शाम को अन्न-जल ग्रहण कर वे अपने व्रत को पूर्ण करते थे। जब वर्ष की अंतिम द्वादशी आई तो उन्होंने विष्णु भगवान की पूजा और विधि-विधान के साथ महाभिषेक किया। अभिषेक के दौरान यह भी अच्छी तरह से ध्यान रखा गया कि किसी सामग्री की कमी ना आए। आयोजन के पुरोहित व ब्राह्मणों के भोज के पश्चात दान-पुण्य के कर्म पूर्ण कर राजा अम्बरीष ने व्रत पूरा करने की आज्ञा मांगी।

जब अम्बरीष के उद्यापन में आए दुर्वासा

जैसे ही राजा भोजन के लिए बैठे वैसे ही वहां महर्षि दुर्वासा पधारे। राजा तुरंत उठ खड़े हुए और ऋषि का आदर-सत्कार कर भोजन करने का विनम्र निवेदन किया। ऋषि दुर्वासा ने भी निवेदन स्वीकार किया परंतु वे बोले कि मैं पहले नदी में स्नान कर आऊं, उसके पश्चात भोजन ग्रहण करूंगा। जब वे नदी में स्नान करने गए तो नहाने और ध्यान कर्म में इतने लीन हो गए कि भूल ही गए कि अम्बरीष का व्रत-पारण मेरे भोजन ना करने के कारण अटका पड़ा है। उधर समय बीतता जा रहा था, द्वादशी तिथि समाप्त होने जा रही थी। यदि उसी दिन पारण ना होता तो राजा अम्बरीष का व्रत खंडित हो जाता और ऋषि को भोजन कराने से पूर्व वे पारण कर नहीं सकते थे।

समस्या बड़ी विकट थी, अम्बरीष भी परिस्थिति से परेशान थे। जब द्वादशी की तिथि समाप्त होने में बहुत कम समय रह गया था, तब उनकी स्थिति को समझते हुए ब्राह्मणों ने सलाह दी कि आप अपने व्रत का पारण जल पीकर करें। इससे आपका व्रत खंडित होने से भी बच जाएगा और ना ही इससे ऋषि से पहले भोजन करने का दोष लगेगा।

राजा अम्बरीष ने भी ब्राह्मणों की आज्ञा मान और शास्त्रों का विधान जान जल ग्रहण करने का निश्चय किया। राजा जल पी रहे थे कि तभी वहां ऋषि दुर्वासा आ पहुंचे ओर यह देख क्रोधित हो गए कि मुझे भोजन कराने से पहले ही राजा ने अपने व्रत का पारण कर लिया। इसके बाद जैसे ही श्राप देने के लिए अपना हाथ उठाया कि अम्बरीष विनती करने लगे – “हे ऋषिश्रेष्ठ! आपको आने में देर हो रही थी और द्वादशी समाप्त होने जा रही थी। इसीलिए पूरे वर्ष के व्रत खंडित ना हो जाएं, यह सोच ब्राह्मणों की आज्ञा से मैंने जल पी व्रत का पारण किया। इसके अलावा मैंने कुछ भी ग्रहण नहीं किया है।”

दुर्वासा का अम्बरीष को श्राप और चक्र का रक्षा के लिए सक्रीय होना

परंतु क्रोध में आ दुर्वासा ने उनकी एक ना सुनी और अपनी जटा का 1 बाल उखाड़कर धरती पर पटक दिया। वे बोले कि राजन तुमने मुझे बिना भोजन कराए व्रत का पारण किया है, इसका अंजाम तो भुगतना पड़ेगा। इससे उत्पन्न होने वाली कृत्या, तुम अम्बरीष का भक्षण करलो। तभी उस बाल से हाहाकार करते हुए कृत्या नाम की भयंकर राक्षसी पैदा हुई जो अम्बरीष को खा जाने के लिए आतुर थी। बिना किसी ग़लती के अपने भक्त को संकट में देख सुदर्शन चक्र उनकी रक्षा के लिए क्रियात्मक हो उठा। चक्र का प्रकाश चारों ओर फैला, फिर गोल घूमकर कृत्या राक्षसी का वध किया और फिर सुदर्शन चक्र दुर्वासा ऋषि की ओर जाने लगा।

त्रिदेवों का दुर्वासा की रक्षा से इंकार

इस नज़ारे को देख और चक्र को अपनी ओर बढ़ता देख ऋषि घबराकर भागने लगे लेकिन चक्र अब उनके पीछे-पीछे ही भाग रहा था। यहां-वहां भागते हुए दुर्वासा ने बहुत-सी जगहों पर छिपने का प्रयास किया परंतु चक्र उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था। बहुत देर भागते हुए दुर्वासा ब्रह्मलोक में पहुंच गए, वे ब्रह्मा जी से रक्षा के लिए पुकार करने लगे। ब्रह्मदेव ने उत्तर दिया कि हे दुर्वासा! मैं तो सृष्टि के रचना कार्य से जुड़ा हुआ हूँ, मृत्यु का कार्य मेरे हाथ में नहीं है। बेहतर होगा आप देवों के देव महादेव के पास जाएं क्योंकि वे तो महाकाल हैं, आपकी मदद वे ही कर सकते हैं।

इसके बाद ऋषि भागे-भागे शिव शंकर के पास पहुंचे और अपना सब हाल कह सुनाया जिसे सुनकर शिवजी मुस्कुराए। फिर बोले कि तुम क्रोध में आकर अपना तपोबल क्यों नष्ट करते हो। यह सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का है, इसीलिए इससे तुम्हें बचाना भी उनके हाथ में ही है। उन्हीं के पास जाकर रक्षा की गुहार लगाओ, मैं इसमें तुम्हारी कुछ भी सहायता नहीं कर सकता।

यह सुनकर अब तो दुर्वासा की हालत और खराब हो गई थी। उनकी सांस फूल रही थी, वे घबराते हुए विष्णु धाम पहुंचे। चक्र भी पीछा करते-करते वहां पहुंच गया। दुर्वासा ने विनती की कि हे प्रभु! मेरे प्राणों की रक्षा करें। विष्णु भगवान ने उत्तर दिया- “दुर्वासा! अभी तक तप करके तुमने जो भी ऊर्जा शक्ति एकत्रित की थी, उसको क्रोध और श्राप के कारण तुमने नष्ट कर लिया है। तुम एक ऋषि हो और ऋषियों के लिए क्षमा-धर्म सबसे बड़ा होता है। मेरे कहे पर मत जाओ बल्कि अपनी बुद्धि से विचार करो कि तुमने जिस भूल के लिए अम्बरीष को श्राप दिया, वो भूल उसने की भी थी या नहीं। मेरे भक्त पर बिना बात का संकट आया देख चक्र उसकी रक्षा हेतु सक्रीय हो गया है। अब केवल एक ही उपाय है, तुम उसकी ही शरण में जाओ जिसकी रक्षा के लिए यह चक्र तुम्हारे पीछे लगा है।

अंततः जब भगवान विष्णु ने भी मदद करने से मना कर दिया तो वे उनकी बात मानते हुए वापस अम्बरीष के पास गए। जब वे पहुंचे तो देखते हैं कि अम्बरीष अभी तक बिना भोजन किए उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। दुर्वासा को देखते ही अम्बरीष बोले कि हे मुनिवर! आप कहां चले गए थे, मैं कबसे आपकी प्रतीक्षा में खड़ा हूं।

अम्बरीष (Ambareesh) ने बचाए दुर्वासा के प्राण

ऋषि दुर्वासा की सांस फूल रही थी और वे घबराते हुए बोले “हे राजन! मैं तीनों देवों के लोक में घूम आया, किसी ने मेरी सहायता नहीं की। यह जो चक्र मेरे पीछे पड़ा है, इससे मेरे प्राणों की रक्षा केवल तुम ही कर सकते हो, मुझे बचालो। इस पर अम्बरीष ने हाथ जोड़ कर दुर्वासा से कहा कि आप अपने गुस्से को पी जाइये, जैसे ही आप मुझे क्षमा कर देंगे, चक्र भी आपको क्षमा कर देगा। दुर्वासा ने जैसे ही अम्बरीष के प्रति क्षमा भाव दिखाया वैसे ही सुदर्शन चक्र गायब हो गया।

Sign Up For Free Horoscope Report

Same Day Report Delivery by Email

Verified Secure
Payment

  • 100% Satisfaction Guarantee
  • Verified Expert Astrologer
  • 100% Secore Payment

Today’s Deal

Todays Deal

Know More About Your Date Of Birth