शनिदेव से जुड़े कुछ अविश्वसनीय रहस्य

न्याय के देवता कहे जाने वाले शनिदेव को हम शायद इतना ही जानते हैं कि वे काफी कठोर दंड देते हैं और अशुभ दृष्टि वाले हैं | आज हम आपको शनि देव से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों से अवगत करवाएंगे जिनका वर्णन पुराणों में मिलता है | हम में से अधिकाँश लोगों को इन बातों की जानकारी नहीं है | ये ध्यान देने योग्य तथ्य और रहस्य हैं –

  • काशी-विश्वनाथ की स्थापना –

स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में उल्लिखित है कि एक बार छाया पुत्र शनि महाराज ने सूर्य देव से कहा कि हे ! पिताश्री मैं एक ऐसा पद पाने की अभिलाषा रखता हूँ, जो आजतक किसी को प्राप्त ना हुआ हो | और साथ ही आपसे सात गुणा बड़ा मंडल, सात गुणा अधिक शक्ति, आपके लोक से सात गुणा ऊंचा लोक की भी कामना है मेरी | मेरे जैसा वेग, सामर्थ्य और शक्ति किसी में ना हो, ना ही देव में, ना दानव में, ना असुर में और ना ही सिद्ध साधक में | इसके साथ मैं एक और वरदान चाहता हूँ कि मैं अपने आराध्य भगवान क्रष्ण के प्रयक्ष दर्शन चाहता हूँ एवं भक्ति और ज्ञान की पूर्णता प्राप्त करूं |

अपने पुत्र की बात सुन सूर्य देव बहुत प्रसन्न हुए और बोले “पुत्र ! तुमने मेरे मन की बात कह दी | मैं भी यही चाहता हूँ कि तुम्हारा प्रताप मुझसे अधिक हो परन्तु यह इतना आसान नहीं है, इसके लिए कठोर तप करना होगा | तुम काशी चले जाओ और वहां शिवलिंग की स्थापना करके अपने तप को पूरा कर |भगवान भोलेनाथ तुम्हें मनवांछित फल प्रदान अवश्य करेंगे |”

शनि देव ने भी अपनी पिता की आज्ञा का पालन किया, पहले अपना तप पूरा किया और उसके उपरांत शिवलिंग की स्थापना की | यह शिवलिंग आज भी काशी-विश्वनाथ के नाम से प्रसिद्ध है | इस प्रकार शनि देव ने अपनी इच्छानुसार वर तो प्राप्त किया ही साथ ही भगवान शंकर की कृपा से सभी ग्रहों में उच्च स्थान भी प्राप्त किया |

  • मोक्ष प्राप्ति के लिए अहम ग्रह –

इस बात से तो सभी परिचित हैं कि शनि देव सूर्य पुत्र हैं लेकिन इसके साथ ही इन्हें पितृ शत्रु भी माना जाता है | और इसी कारण इसे क्रूर, अशुभ और दुखदायी ग्रह भी माना जाता है | परन्तु वास्तव में कर्म का कारक और न्यायप्रिय यह ग्रह इतना भी अशुभ नहीं है, अतः इसे मित्र नहीं बल्कि शत्रु समझना चाहिए | दरअसल, शनि को न्यायाधीश की भूमिका में रखा गया है इसीलिए प्रकृति का संतुलन बरक़रार रखने के लिए वे हर प्राणी के साथ समान रूप से न्याय करते हैं | जो मनुष्य अयोग्य असमानता और असाधारण सम्ताओं जैसी चीज़ों को शरण देते हैं या बुरी आदतों के आदी होते हैं, केवल उन्ही को शनि की अशुभ दृष्टि और प्रताड़ना को सहना पड़ता है | वर्ना मोक्ष प्राप्ति कराने वाला यह एकमात्र ग्रह है |

  • आखिर क्यों हैं यह पितृ शत्रुता –

अपने पिता के शत्रु क्यों हैं शनि देव, आखिर यह बात भी आज हम आपको समझाएंगे| हमारे धर्म ग्रंथों में ये बात वर्णित है कि शनि देव का जन्म सूर्य भगवान की दूसरी पत्नी से हुआ था | माता छाया जब गर्भावस्था में थीं तो उस समय में शिव-भक्ति में इस कद्र मग्न थीं कि खाने-पीने का ख्याल तक उनके आसपास नहीं भटक रहा था | इसका प्रभाव उनके पुत्र पर भी पड़ा और शनि महाराज श्याम रंग के साथ जन्मे |

जब सूर्य देव ने अपने पुत्र को देखा तो स्वयं की आभा के कारण उन्हें विश्वास ना हुआ और वे छाया माता से बोल उठे कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता |तभी से शनि देव अपने पिता के प्रति बैर भाव रखते हैं | और तब शनि देव ने तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया, जब महादेव ने वरदान देने की सहमती दी तब शनिदेव बोल उठे कि सदा से ही मेरी माता छाया का अपमान हुआ है और उन्हें पराजय का मुख देखना पड़ा है | इसीलिए हम दोनों माँ-बेटे की इच्छा है कि आप मुझे इतना बल प्रदान करे जो मेरे पिता के सामर्थ्य से ऊंचा तो हो ही और साथ में मैं उनसे प्रतिशोध भी ले सकूं | तब महादेव ने उन्हें वर दिया कि नवग्रहों में तुम्हे सर्वश्रेष्ठ स्थान की प्राप्ति होगी एवं तुम्हारे नाम से मानव हो या देवता सभी भय से कांपेंगे |

पुराणों में वर्णित बहुत से व्याख्यानों में से एक यह भी है कि माता छाया को छली जानकर सूर्य देव ने अपने ही पुत्र को यह श्राप दे दिया कि तुम्हारी दृष्टि क्रूर और गति मंद हो जाएगी |

  • जब दशरथ को मिला वरदान –

राजा दशरथ अपनी प्रजा के लिए कुछ भी कर सकते थे | एक बार शनि देव के ही कारण उनके राज्य में घोर दुर्भिक्ष का प्रकोप हुआ और अपने राज्य की रक्षा हेतु वे स्वयं शनि महाराज से मुकाबला करने पहुंच गए | राजा का साहस और पराक्रम देख शनि देव बहुत प्रसन्न हुए और उनसे ने वरदान मांगने के लिए कहा | तब दशरथ जी ने भी पूरी श्रद्धा और विधि के साथ उनकी आराधना व स्तुति की | इस घटना की विस्तार में जानकारी के लिए आप पद्म पुराण पढ़ सकते हैं |

  • इसके अलावा और बहुत से हैं रहस्य –

ब्रह्मवैवर्त पुराण में माँ पार्वती और शनि देव का संवाद है जिसमें शनि जी ने बताया है कि जातक को अपनी करनी का भुगतान 100 जन्मों तक करना पड़ता है और इसका पूरा हिसाब मुझे ज्ञात होता है |

एक बार धन की दात्री माँ लक्ष्मी ने भी शनि देव से प्रश्न किया कि जातकों को तुम आर्थिक हानि क्यों पहुंचाते हो, क्यों ऐसा है कि सभी को तुम्हारी प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ता है ? इसपर शनि देव ने उत्तर दिया कि हे माता ! इस सब मेरा क्या दोष जब परमात्मा की कृपा से मुझे तीनों लोकों के न्यायाधीश की भूमिका प्राप्त है, ऐसे में किसी भी अन्याय करनेवाले प्राणी को दण्डित करना मेरा कर्तव्य है |

शनि देव दयालु भी हैं | एक बार अगस्त्य ऋषि ने भी शनि देव से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की थी और तब इन्होने भयानक राक्षसों से ऋषि को मुक्त करवाया था |

  • जिसने किया अन्याय, उसे मिला दंड –

भोले बाबा की पत्नी को भी शनि का प्रकोप झेलना पड़ा था जब उन्होंने सीता का रूप धारण किया और अपनी झूठी सफाई दी, तब अपने पिता के हवन कुंद में उन्हें भी जान देनी पड़ी | वे शनि देव ही थे जिन्होंने उन्हें कूदने पर मजबूर किया |

जब सत्य की मूरत राजा हरिशचंद्र ने अपने दान पर अभिमान किया था तब शमशान की रखवाली और बाज़ार में बिकने जैसे कर्म भी हो गए उनके साथ |

राजा नल और दमयंती के अपराधों का परिणाम यह हुआ कि दर-दर भीख मांगी, और यहाँ तक कि भुनी हुई मछलियाँ भी जल में तैर कर भाग गयी |

जब इतने महान लोगों भी अपनी करनी का फल भुगतना पड़ा तो हम साधारण मनुष्य क्या हैं ? याद रखें कि जाने अनजाने में किये गए हर पाप, हर अपराध का दंड हमें अवश्य मिलेगा |

  • ऐसे दिखते हैं शनि देव –

मत्स्य पुराण में जो वर्णन मिलता है, उसके अनुसार इन्द्र्कान्ति की नीलमणि जैसा शरीर है प्रभु शनि का | उनके एक हाथ में धनुष तो दूसरे में वर मुद्रा है तथा वे गिद्ध की सवारी करते हैं | पापियों और अधर्मियों के लिए इनका संहार करता रूप सदा भयानक और डरावना है | हनुमान की पूजा से भी ये प्रसन्न हो कर दंड को कुछ हद तक कम कर देते हैं |

  • यहाँ हैं शनि देव के मंदिर –

ऐसे तो भारत में महात्मा शनि के बहुत से मंदिर हैं लेकिन इनमें से जो अधिक प्रसिद्ध हैं, वे हैं : शिंगणापुर, ग्वालियर के शनिश्चराजी जो कि पहाड़ी पर स्थित हैं, वृन्दावन के कोकिला वन एवं राजधानी दिल्ली सहित भारत के कई शहरों में इनके मंदिर हैं |

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