प्रभु का सिमरन सबसे उँचा – गुरु नानक देवजी द्वारा दे गयी सीख !

प्रभु का सिमरन सबसे उँचा

सूर्य उदय होने से पहले हर रोज़ , श्री गुरु नानक देव जी ठंडे पानी मैं स्नान करने के लिए नदी मैं जाया करते थे तथा प्रभु की स्तुति में भजन किया करते थे . लेकिन एक दिन वह अचानक अदृशय हो गए. उनके वस्त्र नदी के किनारे पड़े हुए मिले, लेकिन उनका कोई अतापता नहीं था. उनके मित्रो ने उन्हें ढूंढने का बहुत प्रयास किया, श्री गुरुनानक देवजी को चारो दिशाओ में ढूंढा गया. उनके मित्रो को डर हो गया की गुरु नानक देवजी नदी में डूब गए. लेकिंग गुरु नानक देवजी उन सबकी पहुंच से बहुत दूर थे. वह समाधी में लीन थे, जिसमे वह भगवन के समक्ष बैठे थे, भगवन ने उन्हें पराग का एक कप दिया तथा कहा की ” में तुम्हारे साथ हुँ, जाओ और मेरा नाम बार बार सिमरन करो तथा दुसरो को भी यही सिखाओ ” नानक भगवन की भक्ति में इतना डूब गए थे की उन्होंने जपुजी का प्रथम खंड गया : एक ओंकार , सतिनामु करता पुरखु निरभउ निर्वेरु अकाल मूरति अजूनी सेमभ गुर प्रसादी || जपु || आदि सचु जुगादि सचु || है भी सचु नानक होसी भी सचु || ( जपुजी साहिब) ” भगवान ने अपनी कृपा दृष्टि डाली और कहा की ” मेरा नाम भगवान है तथा तुम मेरे दिव्या गुरु हो |

तीन दिनों के बाद , गुरु नानक देवजी नदी से बहार आये | गॉव वालो को विश्वास नहीं हुआ | वे तो गुरु नानक देवजी को दोबारा देखने की आशा ही खो बैठे थे | काफी देर तक नानक जी ने कुछ नहीं कहा | आखिरकार जब उन्होंने बोला तो कहा ” यहाँ कोई हिन्दू नहीं है, कोई मुसलमान नहीं है ” आज से वह हर व्यक्ति को यही उपदेश देंगे की सब समान है और सब भगवान के बच्चे है , इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता के वह किस तरह से भगवान की पूजा करते है | गुरु नानक जी ने यह शिक्षा दी की भगवान के प्रति अपना प्यार दिखाने का सबसे बढ़िया रास्ता यही है की उनके नाम का सदेव सुमरिन करते रहो |

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