घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने जबसे छेदा था पीपल का वृक्ष तबसे आज तक वह वृक्ष ऐसा ही है

महाभारत की बहुत-सी कथाएं अकसर हम पढ़ते आएं हैं या अपने बड़े-बुजुर्गों से सुनते आएं हैं | पर कुछ अद्भुत घटनाएं ऐसी भी थी उस काल की, जो अधिक प्रचलित नहीं हो पाईं | ऐसी ही एक रोचक घटना हम आपके लिए इस बार ले कर आएं हैं, जिसके सत्यता के साक्ष्य अभी भी मिलते हैं | तो आइये लेकर चलें आपको महाभारत काल में –

बात उस समय की है जब महाभारत का युद्ध प्रारंभ होने वाला था और धर्म एवं अधर्म आपस में टकराने वाले थे | कौरव-दल संख्या में बड़ा अवश्य था परन्तु श्रीकृष्ण पांडव सेना का समर्थन कर रहे थे, जो उनकी विजय की संभावनाएं बढ़ा रहा था | युद्ध की तैयारियां अपने ज़ोर पर थीं और तभी ऐसे वक़्त में भीम के पौत्र बर्बरीक ने अपनी माता को एक अलग ही वचन दिया, जो कि यह था कि वह उस पक्ष से युद्ध लड़ेगा जो उसे कमजोर लगेगा | ऐसा निर्णय करने के बाद घटोत्कच-पुत्र बर्बरीक ने महादेव की कड़ी तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न हो शंकर भगवान ने उसे तीन अजय बाण प्रदान किए थे |

जब भगवान कृष्ण को इस बात का पता चला तो वे उसे रोकने की योजना बनाने लगे | कृष्ण जी कुछ भी कर के पांडवों को जिताना चाहते थे, क्योंकि वे धर्म की लड़ाई लड़ रहे थे | बर्बरीक को रोकने के लिए श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का रूप धरा और उसके पास जाकर उसे उकसाने लगे | भगवान उसका परिहास करने लगे और कहने लगे कि तुम तीन बाण से युद्ध लड़ ही नहीं पाओगे | कृष्ण भगवान की कड़वी बातें सुन कर बर्बरीक अपनी योग्यता साबित करने का इच्छुक हो उठा और बोला कि क्योंकि मेरे पास अजेय बाण है इसीलिए मैं पूरी सेना का संहार करने की क्षमता रखता हूँ | और यह कार्य मैं एक ही बाण से कर के दिखाऊंगा, इतना ही नहीं सेना के अंत के उपरान्त मेरा बाण वापस मेरे पास ही आ जाएगा |

बर्बरीक के साहस को देख कृष्ण भगवान बोले कि अगर ऐसी ही बात है तो अभी साबित करो | अभी हम एक पीपल के पेड़ के नीचे खड़े हैं, यदि अपने एक ही बाण से तुमने इसके सभी पत्तों को छेद दिया तो मैं मान जाऊंगा कि युद्ध में तुम कुछ चमत्कार दिखा सकते हो | चुनौती को स्वीकार कर बर्बरीक ने भी भगवान शंकर का स्मरण किया और बाण चला दिया जिससे वृक्ष पर लगे पत्तों में तो सूराख हुआ ही साथ ही जो पत्ते नीचे गिरे थे उनमें भी छिद्र हो गए | इसके बाद भी आश्चर्य की बात यह थी कि बाण अभी भी वापस नहीं गया था क्योंकि कृष्ण मुरारी ने एक पत्र अपने पैरों के नीचे दबा रखा था, अतः बाण लक्ष्य पूरा किये कैसे वापस लौट सकता था ?

अब तो और भी पक्का हो गया था कि बर्बरीक अपनी माता को दिए हुए वचन अनुसार कौरव-सेना को विजय दिलाने का पूरा प्रयास करेगा | बर्बरीक का यह निर्णय अधर्म की जीत के लिए अहम था, इसीलिए धर्म की रक्षा हेतु और भविष्य में होने वाले किसी भी अनिष्ट से बचने के लिए ब्राह्मण रुपी कृष्ण ने उनसे दान माँगा | घटोत्कच पुत्र भी दान देने से पीछे हटने वालों में से नहीं था और दान देने के लिए सहमती जता दी | हाँ सुनते ही यशोदा नंदन ने बर्बरीक का सिर मांग लिया और ब्राह्मण के मुख से ऐसे कठोर शब्द सुनकर वह समझ गया कि यह ब्राह्मण नहीं है |

तब बर्बरीक ने अनुरोध किया कि कृपया मुझे अपना असली परिचय दें | और फिर भगवान ने बता दिया कि वह श्री कृष्ण हैं और सत्य जानने के उपरान्त उसने सिर देना तक स्वीकार कर लिया | लेकिन इतने बड़े त्याग के साथ उसने एक शर्त भी रखी जो यह थी कि वह प्रभु के विराट रूप के दर्शन करना चाहता है एवं महाभारत के युद्ध को आदि से अंत तक देखने का इच्छुक है |

दयालु भगवान मुरलीधर ने भी उसकी कामना पूरी करने का निर्णय लिया तथा सुदर्शन चक्र से उसका सिर काटते ही, सिर पर अमृत का छिड़काव भी करके किसी पहाड़ी के ऊपरी हिस्से पर रख दिया | और फिर बर्बरीक के मुंह ने पूरा युद्ध प्रत्यक्ष रूप से देखा |

जिस घटना का ज़िक्र हमने ऊपर किया वह हरियाणा के हिसार जिले में वीर बरबरान नमक स्थान पर हुई थी | आप खुद ही समझदार हैं, इसीलिए अब शायद यह बताने की ज़रुरत तो नहीं कि बर्बरीक की वीरता पर ही इस जगह का नामकरण हुआ है |

     अब हम आपको इससे भी ज्यादा आश्चर्यचकित बात बताते हैं | वह वृक्ष जिसके पत्रों को बर्बरीक द्वारा श्री कृष्ण के कहने पर छेदा गया था, वह आज भी महाभारत की सत्यता का प्रमाण देता हुआ खड़ा है | इतना ही नहीं बल्कि उसके पत्तों में छिद्र आज भी मौजूद हैं तथा नए निकलने वाले पत्ते भी पहले से ही छेदित होते हैं | अगर इस पेड़ के बीजों से किसी नए पेड़ का रोपण किया जाता है तो उसके पत्ते भी सूराख वाले ही होते हैं | तो है ना यह घोर आश्चर्य की बात !

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