जानिये प्रसाद से जुड़े तथ्य, नियम व लाभ, जिन्हें जान आप हो जाएंगे हैरान !

हिंदू धर्म में मान्यता है कि कोई भी पूजा या अनुष्ठान, आरती और प्रसाद के बिना अधूरा रहता है | अतः ये तभी संपन्न होते हैं जब हम भगवान को भोग या प्रसाद अर्पित करके उसको वितरित करते हैं, स्वयं भी खाते हैं और बाकी सबको भी खिलाते हैं | सिर्फ पूजा में ही नहीं बल्कि हिन्दू सभ्यता में भोजन करने से पूर्व हर बार थोड़ा हिस्सा प्रसाद रूप से ईश्वर को समर्पित किया जाता है |

पवित्रा कही जाने वाली अग्नि को भी हमेशा से ही भोजन अर्पित किया जाता है, जो वह आगे चलकर सभी देवताओं तक पहुंचाती है | नैवेद्य, आहुति और हव्य – ये वे तीन शब्द हैं जिनका सम्बन्ध प्रसाद चढ़ावे से है | देवी-देवता को अर्पित किया जाने वाला प्रसाद नैवेद्य कहलाता है जो हमेशा से ही अपनी शुद्धता एवं सात्विकता के लिए जाना जाता है | इसके अलावा हवन जोकि किसी देवी या देवता की प्रसन्नता के लिए किया जाता है, उसमे अर्पित करने वाले भोजन को हव्य कहा जाता है | और वहीँ किसी उद्देश्य पूर्ती की इच्छा से किया जाने वाला यज्ञ में जो भी हिस्सा चढ़ाया जाता है, उसे आहुति कहते हैं |

यज्ञ, हवन या पूजा जैसे अनुष्ठान में हम जो भोग अर्पित करते हैं इसकी शुरुआत अभी नहीं बल्कि वैदिक काल से हुई है | हमारे पौराणिक ग्रंथों में यह बात वर्णित है कि यज्ञ साक्षात भगवान का रूप होता है जिसमे भोग को पूर्ण श्रद्धा के साथ चढ़ाने से व्यक्ति देव ऋणों से मुक्ति पा जाता है | अब हम आपको आगे बताएंगे कि कौन-सा प्रसाद किस देवी-देवता को अर्पित किया जाता है | इस भक्ति-भाव से किये गए अर्पण के उपरांत यदि आप प्रेम पूर्वक यह भोजन ग्रहण करेंगे तो आपको अद्भुत और अलौकिक लाभ प्राप्त होंगे |

अब देखिये किस को कौन-सा प्रसाद भाता है –

  • भोले नाथ का प्रसाद बनाते समय ध्यान रखें कि उन्हें भांग और पंचामृत बहुत पसंद है | साथ ही इनके नैवेद्य में तुलसी के स्थान पर बेल-पत्र रखें |
  • बुद्धि के देवता गणेश भगवान के प्रसाद में दूर्वा रखना उपयुक्त माना जाता है | ये तो आप जानते ही होंगे कि प्रथम पूज्य गणपति को मोदक और लड्डू चढाने से वे जल्दी प्रसन्न होते हैं |
  • भगवान विष्णु को खीर या सूजी का हलवा प्रसाद रूप में अर्पित करना चाहिए |
  • अम्बे माता अर्थात दुर्गा जी की बात करें तो इन्हें हलवा-पूरी, खीर, मालपुए, नारियल, केले एवं विभिन्न मिष्ठान्न पसंद होते हैं |
  • धन की देवी माँ लक्ष्मी को केसर भात, और श्वेत रंग के मिष्ठान्न भाते हैं |
  • सरस्वती जी को दूध, दही, मक्खन, पंचामृत, एवं खील-परमल, सफेद तिल के लड्डू आदि पसंद होता है |
  • हनुमान जी को भी केसर भात का प्रसाद अर्पित किया जाता है | इसके साथ ही हलवा, बूंदी, पंच मेवा, गुड़ के लड्डू, रोठ या डंठल वाला पान भी समर्पित किया जाता है |
  • नन्द गोपाल यानि कन्हैया जी को माखन और मिश्री पसंद है और ये अर्पित करने से इनकी कृपा आप पर ज़रूर बरसती है |

आपने ये तो जान लिया कि कौन-से देवी-देवता को क्या नैवेद्य अर्पित करें परन्तु उससे भी अधिक ज़रूरी यह जानना है कि इस भोग को किस प्रकार समर्पित किया जाना चाहिए | किस प्रकार का मतलब है कि प्रसाद के भी कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना आवश्यक होता है | तो देखिये ये ध्यान देने योग्य नियम इस प्रकार हैं –

  • प्रसाद में नमक, तेल व मिर्च का प्रयोग वर्जित माना जाता है |
  • नमकीन या तीखे खाद्य पदार्थों की जगह नैवेद्य में हमेशा मीठी वस्तुओं का प्रयोग ही करें |
  • तुलसी पत्र के बिना प्रसाद पूरा नहीं होता, अतः प्रसाद रूप में जो भी बना है उसपर एक तुलसी का पत्ता या तुलसी-दल अवश्य रखें |
  • कभी भी भोग लगाने के तुरंत बाद थाली या बर्तन जिसमे भोग लगाया है, उसे तुरंत ना हटाएं | कुछ देर उसे भगवान के समीप रखा रहने दें फिर उसे सभी भक्त जनों में वितरित कर प्रेम से खाएं |
  • प्रसाद में बलि आदि को समर्पित करना वर्जित माना जाता है |
  • अकसर हम प्रसाद चढ़ाते वक़्त दिशाओं का ध्यान नहीं रखते पर हमारे शास्त्रों और ग्रंथों में बताया गया है कि कच्चे खाद्य पदार्थों को दायीं ओर एवं पके हुए भोग को बायीं ओर रखना चाहिए |
  • प्रसाद अर्पित करने की सही प्रक्रिया यह है कि सबसे पहले भोज्य पदार्थ और जल को अग्नि के समक्ष रखें | इसके उपरान्त जल छिड़कते हुए देवताओं का आह्वान करें |
  • सभी पकवानों का थोड़ा-थोड़ा भाग मंत्रोचारण के साथ अग्नि देव को अर्पित करें और आँख बंद कर अग्नि देव सहित सभी देवताओं का स्मरण करें | इसके बाद फिर से आचमन के लिए मंत्रों का उच्चारण करते हुए भोजन के चारों ओर जल छिडकें एवं हाथ जोड़, नतमस्तक हो सभी देवी-देवताओं को नमन करें |
  • जब आप अपना आहार ग्रहण कर चुके हों उसके बाद भोग वाले हिस्से को गाय, कुत्ते या कौए को दे देना चाहिए |
  • नैवेद्य से सम्बंधित एक बात ये भी है कि इस सात्विक भोजन को हमेशा केले के पत्ते अथवा पीतल की थाली पर ही परोसा जाना चाहिए |
  • वैसे तो हम आपको बता चुके हैं कि किस देवी-देवता का प्रसाद कैसे बनाया जाए परन्तु कुछ वस्तुएं ऐसी हैं जिन्हें प्रत्येक नैवेद्य में रखना चाहिए | ये प्रमुख चीज़ें हैं – दूध-शक्कर, मिश्री, शक्कर, नारियल, गुड़, खीर, मिठाई, फल और भोजन आदि |

अब यदि आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि प्रसाद को अर्पित करने व उसे ग्रहण करने से क्या लाभ हो सकता है ? तो इसका उत्तर भी हम आपको अवश्य देंगे | दरअसल, इससे जहाँ एक तरफ आपकी अपने ईश और आराध्य के प्रति आस्था का विकास होता है तो वहीँ दूसरी ओर आपके जीवन को एक सकारात्मक मोड़ मिलता है | आपके तन और मन को पवित्र, शुद्ध एवं सकारात्मक बनाने के लिए हिन्दू संस्कृति में बहुत से उपाय, कर्म और परम्पराओं का वर्णन मिलता है | और इन सभी को अपनाने से आपका मन एकाग्रचित होता है, आपकी एकाग्रता शक्ति बढ़ती है |

इतना ही नहीं बल्कि आपको आत्मिक शक्ति, असीम आनंद, ऊर्जा एवं नयी आशाओं की भी प्राप्ति होती है | ऐसा भी कहा जाता है कि यदि आप नियमित रूप से प्रसाद और नैवेद्य का वितरण करते हैं तो आसपास का माहौल तो अच्छा रहता ही है, साथ ही लोगों के मन में आपके प्रति अच्छी भावनाएं पनपती हैं | जब आप देखते हैं कि सामने वाले के मन में आपके लिए कोई गलत विचार नहीं है तो आपकी भी उसके प्रति सारी बुरी भावनाएं जैसे राग-द्वेष, इर्ष्या, स्वार्थ आदि समाप्त हो जाती हैं एवं सिर्फ प्रेम और स्नेह रह जाता है |

प्रसाद के फायदों की सूची बहुत लंबी है जिसमें से एक यह भी है कि भगवान का भोग आपको अलौकिकता व दिव्यता प्रदान करता है | ईश्वर से आपका निरंतर जुड़ाव आपके मन की सकारात्मकता को कई गुणा बढ़ा देता है | यकीन मानिए कि हर संकट में भगवान आपकी रक्षा के लिए स्वयं खड़े रहते हैं |

प्रसाद को श्रद्धा से खाने से इस लोक में तो आपका जीवन सुलभ बनता ही है, साथ ही मृत्यु के पश्चात भी भगवान अपने धाम में सेवा का अवसर प्रदान करते हैं| सुख-समृद्धि एवं अद्भुत अनुभव आपके जीवन का हिस्सा बन जाते हैं | इसके अतिरिक्त और भी कई फायदे हैं इस शुद्ध-सात्विक नैवेद्य के |

अब बात करें भगवदगीता की तो उसमे भी उल्लिखित है कि प्रसाद ग्रहण करने वाले मनुष्य को अपने आराध्य के धाम में ही वास मिलता है | इसके साथ ही बहुत से लोगों के मन में यह शंका भी रहती है कि क्या जो प्रसाद हम अर्पित करते हैं, वह भगवान खाते भी हैं या नहीं | तो इसका उत्तर भी प्रभु कृष्ण ने स्वयं दिया है, उन्होंने कहा है – “पत्रं, पुष्पं, फलं, तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति,

     तदहं भक्त्युपह्रतमश्रामि प्रयतात्मनः ||”

     अर्थात – जो कोई भी भक्त प्रसाद रूप में प्रेम से मेरे लिए पत्र (पत्ते), पुष्प (फूल), फल या जल आदि अर्पित करता है, उस पवित्र आत्मा का अर्पण किया हुआ नैवेद्य मैं सगुण प्रकट होकर ग्रहण करता हूँ और बहुत ही चाव से खाता भी हूँ |

               प्रसाद, भोग या नैवेद्य कुछ भी कहें इसके फायदे अनेक हैं | परन्तु ध्यान रहे कि अर्जुन को गीता ज्ञान देते हुए श्री कृष्ण ने यह बभी बताया है कि जब व्यक्ति प्रभु के धाम में पहुँच जाता है, उसके बाद उसे एक नया जन्म मिलता है | अर्थात प्रसाद खाने से भी आप जन्म-मरण के चक्र से छूट तो नहीं सकते लेकिन अपने जीवन को एक नई दिशा अवश्य दे सकते हैं जो आपको शक्ति और विद्या जैसे लाभ प्राप्त करवाएगा

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