पापमोचनी एकदशी व्रत का महत्व

पापमोचनी एकदशी व्रत का महत्व

पापमोचनी एकदशी व्रत का महत्व

पापमोचनी एकदशी व्रत का महत्व ,

पापमोचनी एकादशी व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकदशी का होता है . यह एकादशी इस बार 4 अप्रैल को है,

इस विषय मैं राजा मन्धाता और महर्षि लोमेश से सम्बंधित कथा युधिष्ठिर को भगवान् कृष्ण ने सुनाई थी.लोमेश ऋषि ने मान्धाता से कहा - अप्सराओ द्वारा सेवित चैत्ररथ नमक सुन्दर वन मैं मंजुघोषा नामक अप्सरा को  स्वर्ग के राजा इंद्र ने उसी स्थान  मैं तपस्या कर रहे ऋषि मेधावी की तपस्या को भांग करने के लिए भेजा. शाप के भय से मंजुघोषा आश्रम से एक कोस दूर ही वीणा बजते हुए मधुर गीत गाने लगी. टहलते हुए मुनि वह जा पहुंचे और उसी समय सहायक  के रूप  मैं पहुंचे कामदेव ने मुनि में मंजुघोषा के प्रति काम भावना भर दी. ऋषि काम मैं वशीभूत होगये . बरसो बीत गए. मंजुघोषा ने देखा की अब इनका तप पुण्य टूट गया है. तपस्या भंग हो गयी है . वह देवलोक जाने को तैयार हुई और कहा " मुझे अपने देश जाने की आज्ञा दीजिये.

मेधावी बोले ' जब तक सवेरे की संधया हो जाये तब तक तो  मेरे पास ही ठहरो '. अप्सरा ने कहा ऋषिवर बहुत सी संधया बीत चुकी है '. मुनि चौके और देखा 57 बरस बीत गए थे. क्रोध मैं वो बोले ' मेरी तपस्या भंग की जा पिशाची होजा मंजुघोष ने डर के कहा " मेरे शाप का उद्धार करे ऋषिवर. सात वाक्य बोलने या सात कदम साथ साथ चलने मात्र से ही सतपरुषो में मैत्री हो जाती है  फिर मै तो आपके साथ बरसो रही हु। मेधावी को मंजुघोषा की बात समझ आगयी , उन्होंने कहा - चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी